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जिला अदालत ने कृष्ण जन्मभूमि से मस्जिद हटाने की मांग वाली याचिका स्वीकार कर ली है

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Image Credits: Zee News

October 16, 2020

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मथुरा की जिला अदालत ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि परिसर से सटी मस्जिद हटाने की मांग करने वाली याचिका स्वीकार कर ली है।

इससे पहले मथुरा की सिविल अदालत ने यह याचिका खारिज कर दी थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि इस मस्जिद का निर्माण श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर किया गया है। जिला जज साधना रानी ठाकुर ने अब यह याचिका स्वीकार की है, जिस पर 18 नवंबर को अगली सुनवाई होगी।

याचिका स्वीकार

‘श्रीकृष्ण विराजमान’ की ओर 13.37 एकड़ जमीन के मालिकाना हक के लिए सिविल कोर्ट से याचिका खारिज होने के बाद 13 अक्टूबर को जिला जज अदालत में याचिका दायर की गई थी। आज इसे स्वीकार कर लिया गया है। याचिका में श्रीकृष्ण जन्मस्थान की 13.37 एकड़ जमीन को शाही ईदगाह से मुक्त कराने की मांग की गई है। ‘श्रीकृष्ण विराजमान’ की तरफ से रंजना अग्निहोत्री के वकील हरिशंकर जैन, विष्णु शंकर जैन और पंकज कुमार वर्मा ने दलील दी।

रंजना अग्निहोत्री के माध्यम से श्रीकृष्ण विराजमान द्वारा सिविल कोर्ट में दायर मुदकमे में कहा गया था कि उत्तर प्रदेश सुन्नी वक्फ बोर्ड, ट्रस्ट मस्जिद ईदगाह या मुस्लिम समुदाय के किसी भी सदस्य को कटरा केशव देव की संपत्ति में कोई दिलचस्पी या अधिकार नहीं है।

यह पूरी 13.37 एकड़ भूमि देवता भगवान श्री कृष्ण विराजमान में निहित है। यह मुकदमा मस्जिद ईदगाह की प्रबंधन समिति द्वारा जमीन पर किए गए अतिक्रमण को हटाने के लिए किया गया था।

1968 में हुआ था फैसला

मुकदमे में कहा गया था कि 1815 में अंग्रेजों ने जमीन की नीलामी कर राजापाटनी मल को बेची थी। 1944 में राजापाटनी के वारिसों ने जमीन पंडित मदन मोहन मालवीय, गोस्वामी गणेश दत्त को 19,400 रुपये में बेच दी। उन्होंने मार्च 1951 में एक ट्रस्ट बनाया और जमीन पर मंदिर बनाने की घोषणा की। अक्टूबर 1968 में श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संघ और शाही मस्जिद ईदगाह सोसाइटी के बीच जमीन का ट्रस्ट होने पर समझौता हुआ था।

कुछ लोगों का दावा है कि 17वीं सदी की शाही ईदगाह मस्जिद श्रीकृष्ण के जन्मस्थान कटरा केशव देव मंदिर के परिसर में 13 एकड़ पर बनी है। कोर्ट में दायर की गई पहली याचिका में 1968 में मथुरा कोर्ट द्वारा सुनाए गए उस फैसले को भी रद्द करने की मांग की गई थी, जिसके आधार पर श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और शाही ईदगाह प्रबंधन समिति के बीच समझौता हुआ था।

सिविल कोर्ट से ख़ारिज थी याचिका

सिविल कोर्ट ने 1991 के कानून के आधार पर याचिका खारिज की थी। कोर्ट ने कहा था कि प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट, 1991 के तहत 15 अगस्त, 1947 से पहले बने सभी धर्मस्थलों की यथास्थिति बनाए रखने का प्रावधान है। इस कानून में सिर्फ अयोध्या मामला ही एक अपवाद रहा है। कोर्ट ने कहा इस याचिका पर सुनवाई के लिए स्वीकार करने के पर्याप्त आधार नहीं हैं। ऐसे में इसे तत्काल प्रभाव से खारिज किया जा रहा है।

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