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26 वर्षीय महिमा भलोटिया  ने डिजिटल पाठशाला के जरिए बुजुर्गों को बनाया टेक्नोलॉजी फ्रेंडली

तर्कसंगत

October 22, 2020

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देश के वरिष्ठ नागरिक, जो टेक्नोलॉजी (technology) के साथ खुद को अपग्रेड ( upgrade) करने के लिए संघर्ष कर रहे थे, COVID-19 महामारी की शुरुआत के साथ गंभीर रूप से प्रभावित हुए और सामाजिक बहिष्कार (social exclusion) भी उनमें चिंता और अकेलेपन का कारण बना। इस मुद्दे से निपटने के लिए, महाराष्ट्र के मुंबई से महिमा भालोटिया ने बुजुर्ग नागरिकों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने का पहल किया। सेल्फी क्लिक करना, व्हाट्सएप पर मैसेज भेजना ,ऑनलाइन ऑर्डर या कैब बुक करने की कला कुछ ऐसे कार्य थे जो बुजुर्ग  व्यक्तियों को जल्द से जल्द सीखना था।

कोरोनोवायरस-प्रेरित लॉकडाउन से पहले किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, 60% बुजुर्गों ने महसूस किया कि उनके बच्चों के पास, टेक्नोलॉजी से जुड़ी नई नई चीजों को सिखाने का समय नहीं है।

यह सर्वेक्षण (survey) हेल्पएज इंडिया द्वारा किया गया, जो एक गैर-सरकारी संगठन है, जो देश में वंचित वृद्ध व्यक्तियों की देखभाल और उत्थान की दिशा में काम करता है। द टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया कि आठ राज्यों के कई शहरों के 1,580 बुजुर्गों का सर्वेक्षण किया गया।

यह पता चला कि आधे से अधिक बुजुर्ग ऑनलाइन बैंकिंग पोर्टल्स का उपयोग करना, उपयोगिता बिलों का भुगतान, भोजन का आर्डर और दवाइयों को ऑनलाइन ऑर्डर कैसे करें यह सीख रहे थे अन्य लोग टेक्नोलॉजी का अधिक उपयोग करते हुए गूगल मैप कैसे यूज करें ,ईमेल पर अकाउंट कैसे बनाएं, वीडियो कॉलिंग एप्स कैसे उपयोग करे यह सारी चीजें सीखना चाहते थे।

लगभग 47% वरिष्ठ नागरिकों ने अपने दम पर डिजिटल उपकरणों का उपयोग करने का तरीका सीखा, उनके बेटों ने(25%) और बेटियों (18%) सिखाया था।

अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि देश के वरिष्ठ नागरिक, जो तकनीकी प्रगति के साथ संघर्ष कर रहे थे, COVID-19 महामारी की शुरुआत के साथ गंभीर रूप से प्रभावित हुए थे। इस सामाजिक बहिष्करण ने उनके बीच चिंता और अकेलेपन की समस्याओं को भी जन्म दिया।

इस मुद्दे से निपटने के लिए, महाराष्ट्र के मुंबई की 26 वर्षीय “महिमा भालोटिया”  ने बुजुर्ग नागरिकों को डिजिटल रूप से सशक्त बनाने की पहल करने का सोचा।

उनकी पहल द सोशल पाठशाला, में महिमा ने एक कोच की भूमिका निभाई और अपने विशेष छात्रों को  जो 50 वर्ष से अधिक आयु के है उनको, टेक्नोलॉजी से अपग्रेड करने के लिए  ऑनलाइन सत्र आयोजित किया।

 

 

आपके मन में यह विचार  कैसे आया? 

“COVID की वजह से  बहुत से बुजुर्ग लोगों को खुद को सुरक्षित रखने के लिए घर के अंदर रहने के लिए , मजबूर होना पड़ा और उनमें से अधिकांश डिजिटल दुनिया के ज्ञान की कमी के कारण तकनीकी रूप से विकलांग थे।

मेरे पिता  को अक्सर मैंने उनके दोस्तों के साथ यह चर्चा करते हुए सुना है  कि कैसे उन्हें किराने का सामान और दवाएँ ऑनलाइन ऑर्डर करने के लिए अपने परिचितों और बच्चों पर निर्भर रहना पड़ता था।  मेरी हमेशा से यही इच्छा थी कि मैं इस परेशानी के लिए कुछ बेहतरीन कर सकूं, लेकिन मेरे कॉर्पोरेट जीवन के कार्यकाल के कारण, मुझे कभी भी अपना खुद का कुछ शुरू करने का मौका नहीं मिला, COVID महामारी में अपनी नौकरी गंवाने के बाद, मैंने आखिरकार कार्यक्रम को किकस्टार्ट करने का मन बना लिया, ”महिमा ने तर्कसंगत की टीम को बताया।

महिमा ने यह बताया कि इस कार्य को करने के लिए व्यावहारिक रूप से धैर्य की एक बड़ी मात्रा में आवश्यकता होती है, खासकर तब जब सब कुछ डिजिटली करना हो।

“मैं जो कुछ करती हूं उसमें, हमेशा खुशी  ढूंढती हूँ, मेरे परिवार ने मुझे द सोशल पाठशाला शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया क्योंकि उनका मानना ​​था कि मैं अपने दयालु और प्रेमपूर्ण स्वभाव के कारण वरिष्ठ नागरिकों को टेक्नोलॉजी से अपग्रेड करने में मदद कर सकती हूं।

जब मैंने महामारी के दौरान धोखाधड़ी के मामलों की संख्या में वृद्धि के बारे में पढ़ना शुरू किया, तो मैंने देखा कि  उसमें ज्यादातर वरिष्ठ नागरिक शामिल थे और पहली बात जो मेरे दिमाग में आई थी, वह यह कि इसका कारण क्या है ? मुझे पता चला कि इस तरह की घटनाओं के पीछे ऑनलाइन दुनिया के बारे में जागरूकता की कमी थी, फिर मैंने  ऐसे बुजुर्गों के लिए कुछ मूल्यवान करने का फैसला किया।

 

 इसकी शुरुआत आपने कैसे की? 

पहल का पहला सत्र कोलकाता में मेरे विस्तारित (joint) परिवार के लिए था जिसने  कुछ उपयोगी व्हाट्सएप सुविधाओं को सीखा। वे हमेशा सोचते थे कि व्हाट्सएप इतना सरल है, इसमें सीखने जैसा क्या है “लेकिन मैं कुछ चीजें जानती थी जो निश्चित रूप से उनकी मदद करेंगे। तब से लेकर आज तक  मैंने पीछे मुड़कर नहीं देखा है,” युवा सोशलप्रेन्योर ने कहा।

 

 

 यह डिजिटल पाठशाला काम कैसे करता है? 

महिमा ने अपने डिजिटल पाठशाला के  बारे में बताते हुए कहा कि  ऑनलाइन क्लास रविवार को सुबह 11 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक आयोजित किए जाते हैं और एक सत्र के लिए ₹99 की राशि, प्रति व्यक्ति शुल्क लिया जाता है। यह सब कुछ  बुजुर्गों के आवश्यकताओं और आराम को ध्यान में रखकर, तय किया गया है।

जो भी लोग सीखना चाहते हैं वह कॉल पर या व्हाट्सएप टेक्स्ट के माध्यम से पता लगा सकता है। इच्छुक उम्मीदवारों के साथ एक चर्चा के बाद, वे उन विषयों के लिए सत्र में शामिल होते हैं जिन्हें वे पसंद करते हैं और चुनते हैं।

“सभी ऑनलाइन सत्र बहुत धैर्य, सहभागिता और दृढ़ता के साथ आयोजित किए जाते हैं। सत्रों में अधिकतम 25-30 प्रतिभागियों को अनुमति दी गई है, क्योंकि इसमें कक्षा के दौरान बहुत अधिक अभ्यास की आवश्यकता होती है। छात्रों के साथ दोस्तों जैसा व्यवहार किया जाता है। ताकि वह संदेह  यह प्रश्न पूछने में संकोच न करें।

कक्षा की शुरुआत में  सारे छात्रों को उनके जज्बे और इस उम्र में भी कुछ नया सीखने के जुनून के लिए बधाई दी जाती है, कक्षा मैं 95% चीजें प्रैक्टिकल तरीके से सिखाई जाती है एंड्रॉइड और आईओएस दोनों वर्ग के उपयोगकर्ताओं से संबंधित पहलुओं के ऊपर ध्यान दिया जाता है| जिसमें  सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया से जुड़ी चीजों , अहम बातों को  बताया जाता हैं-महिमा ने विस्तारित रूप से बताया।

 

इस काम को करने के लिए आपको प्रेरणा कहां से मिली? 

पुरानी पीढ़ी को तकनीक-प्रेमी बनाने का विचार कैसे आया, इस पर  चर्चा करते हुए महिमा ने तर्कसंगत की टीम को बताया कि यह एक साल पुरानी पहल थी जिसका विचार मुझे अपने ऑफिस की कैंटीन में आया एक दिन लंच के दौरान,  महिमा के बॉस ने उन्हें  , बताया कि उनकी मां कैब ना बुक कर पाने के कारण, उन्हें बार-बार कॉल कर रही है, और वह काम की वजह से उनकी  मदद करने में असफल है, यद्यपि महिमा के दिमाग में यह विचार था, लेकिन वह अपनी कार्य की वजह से समय ना होने के कारण के इस विचार पर  आगे कुछ नहीं कर पाई।

“COVID-19 महामारी की शुरुआत के साथ, मुझे काफी ज्यादा खाली समय मिला। मेरी माँ ने मुझे फिर से सामाजिक पाठशाला को  शुरू करने का सुझाव दिया। मुझे यकीन नहीं था, मैंने सोचा  कि बुजुर्ग लोग सीखने के लिए आनलाइन कक्षाओं की मदद क्यों लेंगे?

उनके बच्चे उनकी मदद कर सकते हैं। वे , इस चीज के लिए पैसे क्यों देंगे ? मेरी मां ने मुझे इसे आजमाने के लिए कहा। मैंने मना नहीं किया, मैंने स्थानीय समाचार पत्रों में विज्ञापन दिया क्योंकि मेरे लक्षित दर्शक यही थे। अगली सुबह उठते ही मुझे कई कॉल आने लगे जो कि ऑनलाइन कक्षाओं के द्वारा डिजिटली कुछ सीखना चाहते थे|

मेरा पहला छात्र 67 साल का था,  जिन्हें मैं ‘ एडवोकेट अंकल’ कहती थी। मैंने उन्हें पहली कक्षा में एक फेसबुक अकाउंट खोलने में मदद की, और बाद की कक्षाओं में अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के बारे में बताया  वह फेसबुक के जरिए अपने बचपन के दोस्तों से  जुड़ कर बेहद खुश थे  महिमा ने तर्कसंगत की टीम को बताया|

 

 

आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? 

अपनी पहल को अंजाम देते समय युवा चेंजमेकर ने जिन चुनौतियों का सामना किया, उन पर प्रकाश डालते हुए कहा, “ बेसिक टेक्नोलॉजी सिखाना बहुत सारे लोगों को आसान काम लगता होगा, लेकिन  बहुत कम, लोग यह समझ पाएंगे कि मुझे  कितनी बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा इस काम को करने के लिए सबसे बड़ी चुनौती हर गुजरते दिन के साथ अधिक धैर्य रखना सीख रही थी। वरिष्ठ नागरिकों द्वारा उठाए गए प्रश्न  सरल  होते थे मगर ऐसे लोग जिन्होंने कभी टेक्नोलॉजी को समझा ही नहीं या खुद को ज्यादा सहज महसूस नहीं किया उन्हें छोटी छोटी चीजें भी समझाना  अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी।

महिमा ने कहा, “चुनौतियां हैं, लेकिन प्यार, धैर्य और समझ से निश्चित रूप से इसे दूर किया जा सकता है।”

महिमा ने अपने छात्रों से कुछ किससे भी साझा किए , जिसके जरिए, उन्होंने बताया कि हसते हुए जीवन के सबक भी प्राप्त किए।

 

 आप अपने अनुभवों को बारे में कुछ बताइए 

“मेरा पहला छात्र मुंबई का एक 67 वर्षीय वकील था। वह जीवन भर अकेले रहा  था और वह अपने पोते को उपहार देना चाहता था  महावारी की वजह से वह  अपने पोते से मिल नहीं सकता था इसलिए वह उपहार भेजना चाहता था । मैंने सुझाव दिया कि  ऑनलाइन खरीदारी कर सकते हैं, लेकिन उन्होंने कहा, ‘नहीं, मैं अपने क्रेडिट कार्ड का उपयोग नहीं करना चाहता, यह जोखिम भरा है।’ मुझे उन्हें प्रक्रिया समझाने में पाँच दिन लगे और आखिरकार, उनहोंने ऑनलाइन शॉपिंग की। वह , टेक्नोलॉजी से जुड़ी चीजें सीखने के लिए बेहद उत्साही थे और  उन्होंने क्लास में सीखी जाने वाली बहुत सी चीजों का इस्तेमाल किया, जैसे – रिमाइंडर सेट करना, व्हाट्सएप पर लोकेशन भेजना, शेयर करना व्हाट्सएप पर अन्य दोस्तों के साथ संपर्क आदि।

एक और रोचक कहानी मेरे 69 वर्षीय सिविल इंजीनियर छात्र की है जो अपनी पत्नी और माँ के साथ मुंबई में अकेला रहते है। उनकी दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है और वह एक  खुशमिजाज व्यक्ति हैं। वह यह नहीं जानते थे कि ऑनलाइन खाना कैसे आर्डर किया जाता है और वही सीखना चाहते थे। उनकी पत्नी   को पिज्जा खाना बेहद पसंद था और लॉकडाउन के दौरान डोमिनोज़ से खाना चाहती थी। उन्होंने विशेष रूप से उस इच्छा को पूरा करने के लिए एक क्लास ली और सीखा कि कैसे डोमिनोज़ से पिज्जा ऑर्डर किया जा सकता है , तथा  दूसरी खाने की चीज़ें  कैसे ऑर्डर कर सकते हैं, “महिमा ने बताया। द सोशल पाठशाला के भीतर अन्य पहलुओं और इसके बारे में उनकी भविष्य की योजनाओं के बारे में बात करते हुए, उन्होंने कहा,” अब होममेकर महिलाओं के साथ काम करके उन्हें डिजिटल स्पेस को समझने में मदद कर रहे हैं। मैंने देखा कि अगर वे ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म की ओर रुख करते हैं तो ये , होममेकर्स कई गुना बढ़ सकते हैं।

महिमा कई एनजीओ के साथ भी  काम, कर रही है और वह एनजीओ महिमा को वरिष्ठ नागरिकों के साथ , जोड़ती  है जोकि टेक्नोलॉजी से रिलेटेड चीजें सीखना चाहते हैं|

 

 डिजिटल पाठशाला से जुड़ी भविष्य में क्या योजनाएं हैं आपकी? 

मेरी भविष्य की योजनाओं में विश्व स्तर पर इस पहल का विस्तार करना शामिल है क्योंकि मैं जानती हूं कि दुनिया में बहुत सारे वरिष्ठ नागरिक हैं जो डिजिटल रूप से सशक्त नहीं हैं। मेरा उद्देश्य है कि उन्हें हर नए , टेक्नोलॉजी, के साथ अपग्रेड कर सकूं ताकि उन्हें अपने बच्चों के  खाली समय में चीजें सीखने का इंतजार करना ना पड़े। मैं महात्मा गांधी के , विचार पर दृढ़ता से विश्वास करती हूं – “वह परिवर्तन जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं उसकी शुरूआत स्वयं से करनी चाहिए और मुझे लोगों के जीवन में बदलाव लाकर, बेहद खुशी मिलती है महिमा ने बताया। तर्कसंगत की टीम महिमा के इस बेहतरीन विचार और वरिष्ठ नागरिकों के प्रति इस पहल को शुरू करने के लिए बधाई देती है और आशा करती है कि, भविष्य में जो भी उनकी इच्छाएं हैं  इस पहल को लेकर वह सब कुछ सफल हो।

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