मेरी कहानी : मुंगेर, मोहल्ला और छठ पूजा my story apurwa

मेरी कहानी

मेरी कहानी : मुंगेर, मोहल्ला और छठ पूजा

तर्कसंगत

November 9, 2020

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आज बहुत दिनों के बाद अपने मुहल्ले की गलियों को गौर से देखा। झड़ी हुई पत्तियो के तरह बेबस मेरी ओर ताक रहा था। ऐसा लग रहा था कि कुछ पूछना चाहता है। कुछ याद दिलाना चाहता है। हमने भी सोचा कि चलो कुछ पल ठहर कर सुन लेते है। एक अजीब सी शिकायत थी उन गलियो को हमसे। जैसे कि किसी मोहोबत करने वाले का दिल दुखाने वाले से होता है। नजाने ऐसा क्या कर दिया था हमने।

थोड़ी दूर बढ़ कर वो गली तो यूँ मुड़ गयी जैसे नाराज़ होकर हमसे मुँह फ़ेर लिया हो। हमने भी जद्दोजहद में आखिर पूछ ही लिया कि इतने भी क्या रुस्वा हो। इससे पहले की गलियां हमसे या हम उन गलियों से कुछ कह पाते, चाँद ने ढलती शाम से उसके सिंदूरी ओजस को बड़ी बेरहमी से छीन लिया था। चाँद है ही ऐसा एक दिखावटी टुकड़ा। वो चाँदनी जिसे वो क़ैद कर इतने गुरूर से अपना कहता है,आस लगाए बैठी होती है की एक बार फिर सुबह होगी और एक बार फ़िर वो चांदनी से तेजस्वी कहलाएगी। वो बेगैरत चाँद,सूरज से तेज़ उधार लेकर यू इतराता रहा के जैसे सबसे अज़ीज़ है। ऐसे निर्लज्ज चाँद की तो मर्यादा भी एक छल है।

हम चाँद की यू बड़ी सख्ती से निंदा कर ही रहे थे कि गलियों ने आखिर में हम पर कुछ नुकीले तंज कस डाले। कहा, “जिस चाँद को यू सारेआम लज्जित कर रही हो, उस चाँद को पाने के लिए तुमने इन गलियो से नाता तोड़ लिया था। उस चाँद की चाँदनी बन कर इस जहाँ में खूबसूरत कहला पाओ इसलिए उन गुनगुने शामो का तिरस्कार कर दिया था। उस चाँद को पाने की चाहत में तुमने घर छोड़ दिया था।”

उन गलियों ने तो जैसे हमें एक ही पल में गुनहगार करार कर डाला। और हम अपनी सफाई में कुछ कह भी न सके। हैरान तो मगर हम तब भी मालूम पड़ते थे। वो बेजान गालिया जिसे हमारे अहँकार ने कुछ भी नही समझा था आज भी इतनी उदार थीं कि अपनी दुखती छाती पर हमें फ़िर एक बार चलने की इजाज़त दे दी।अचानक ही सही मगर ऐसा लगा कि समूचा बचपन आंखों के सामने एक बार फिर खेल गया।

यू समझ लीजिये की इस विशाल पृथ्वी की आकृति पर मुंगेर एक खोया हुआ जहां हैं। अपने आप मे ही मगन एक बंजारा सा मोहोल्ला। हां! मोहल्ला। क्योंकि हमारी निगाहों से देखियेगा तो बचपने में इस मोहल्ले को ही हमने मुंगेर घोषित कर दिया था।सारा जहां तो यही था। अपना वो खटिया जिसको आंगन में बिछा कर हज़ारो तारे गिन लिए जाते थे, आजकल कमरे में दीवान बन गया है, तारे तो जैसे बिछड़े यारो के तरह कही विलुप्त हो गए है। हाँ! हमारे घर मे लालटर्न भी तो था मगर आज कल वो भी LED लाइट बन कर दीवारों पर इतराया करता हैं मगर नजाने क्यो उसकी रोशिनी भी डिम सी लगती है।

शिक़वा नहीं कर रहे हम न इतनी हमारी हैसियत है। बस कुछ पुरानी यादें जिनको हमने कही न कही पीछे छोड़ दिया था,आज कल ख्वाब बन बैठें हैं, उनसे फिर एक बार रूबरू हो रहे हैं।

छट्ठ जिसको महापर्व भी कहते है, हमारे लिए केतारी दांत से छिल के खा पाने जैसा दुलभ करतब कर दिखाने का एक मौका मात्र हुआ करता था। इसके अलावा ठंडे बालू पर खाली पैर चलने का मज़ा, एक आधी हवा मिठाई और पानी मे ज़्यादा दूर तक जाने का साहस कर पाना। इस महापर्व के शायद इतने ही मायने थे हमारे जीवन मे। परिवार के लोगो को तो हम कभी रत्ती भर भी भाव नही दिया करते थे। हम तो ये समझते थे कि ये सब लोग हमेशा के लिए है। जिस प्रकार उस दिन घाट पर हमारी ऊँगली थामे घर का कोई न कोई हर पल मौजूद रहता है, उसी प्रकार हमने ये सोचने का दुस्साहस किया कि सारा जीवन हमारी ऊँगली पकड़ने के लिए कोई न कोई सदैव मौजूद रहेगा।

आज वो महापर्व फिर एक बार लौट के आया है। आज केतारी एक बार फिर दाँत से छिलने का करतब दिखाएंगे हम। फर्क केवल इतना होगा कि कुछ लोग मौजूद नहीं होंगे ताली बजाने के लिए। तस्तरी में कद्दू भात भी कम होगा और घाट में उंगली पकड़ के रखने के लिए कुछ हाथ पीछे हट चुके होंगे।

मगर फिर भी मुस्कुरा कर कहेंगे की इस बार छट्ठ में दो नन्हे नन्हे हाथों के सामने हमारे हाथ का आकार सहसा बड़ा मालूम पड़ने लगा है। इस बार हाथ पकड़ने की बारी हमारी है। छोटो को कद्दू भात और कचरी परोस कर उनके अनमोल दो नैनन में अपना बीता हुआ बचपन भी टटोल लेंगे।

नास्तिक हैं इसीलिए प्रार्थना नही करते है कभी। हाँ! एक वादा अवश्य करना चाहेंगे अपने आप से कि जीवन में प्रतिदिन आभार व्यक्त करेंगे और सही मायने में जीवन जीना नहीं भूलेंगे।क्योंकि ये अनमोल उज्ज्वल जीवन एक दिन अनंत अंधकार में विलुप्त हर हाल में हो जायेगा।

इस बार छट्ठ में उस सूरज को गौर से एक बार देखियेगा ज़रूर और सोचियेगा कितने और छट्ठ लगेंगे आपको ये समझने में की जीवन काल एक क्षण भर का तो खेल हैं। आगे आईये, बढ़ चढ़ के हिस्सा लीजिये, खूब खेलिये तभी तो इस क्रीड़ा के बाद वाली नींद चैन की आ पायगी।

 

लेखिका: अपूर्वा श्रीवास्तव 

 

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