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ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ी जरूरतों को पूरा करने में एक छोटी कदम से आगे बढ़ रह है “प्रोजेक्ट पहुंच”

तर्कसंगत

November 22, 2020

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किसी ने सच ही कहा है कि यदि मन में दृढ़ संकल्प और इरादे मजबूत हो तो कोई भी इंसान समाज के हित में अपना योगदान दे सकता है, इसी सोच के साथ आगे बढ़ते हुए मलाइका (Malaika) और ईशान शिवलकर (Ishaan Shivalkar) ने जो कि खुद एक छात्र हैं , मिलकर ‘प्रोजेक्ट पहुंच’ (Project Pahunch) को शुरू करने का फैसला किया|

प्रोजेक्ट “पहुंच”  क्या है ? 

प्रोजेक्ट पहुंच के जरिए ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ी सारी सुविधाएं उन बच्चों को प्रदान की जाती है जो  उनको पूरा करने में असमर्थ है तथा ऑनलाइन शिक्षा से जुड़ी कठिनाइयों की वजह से कोई भी बच्चा शिक्षा से दूर ना हो जाए इस बात को मद्देनजर रखते हुए प्रोजेक्ट पहुंच को शुरू  किया गया है|

 

 

आपको समाज की इस उभरते हुए समस्या के ऊपर काम करने के लिए प्रेरणा कहां से मिली? 

हमारे घर पर जो महिला घरेलू सहायक के तौर पर काम करने आती थी उनकी बेटी पायल को जब हमने देखा कि वह पड़ोसी से फोन मांग कर अपने ऑनलाइन  क्लासेस कर रही है और उसे बहुत ही कठिनाई हो रही  है लेकिन उसके पास और कोई विकल्प भी नहीं था क्योंकि  महामारी की वजह से सारे स्कूल बंद थे और शिक्षा अब ऑनलाइन  हो रही थी, उसकी समस्या को देखते हुए हमें इस बात का एहसास हुआ कि पायल जैसे और भी ना जाने कितने बच्चे होंगे जो इस तरह की कठिनाइयों का सामना कर रहे होंगे,  और तभी हमने ऐसे बच्चों की मदद करने का फैसला किया |

20 वर्षीय मलाइका शिवालकर जोकि नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, जोधपुर में एक छात्रा है, तथा 16 वर्षीय ईशान शिवालकर, जय हिंद कॉलेज के छात्र हैं, उन्होंने इस मुद्दे पर काम करने का फैसला तो कर लिया लेकिन वह बताते हैं कि उनके पास कोई रोड मैप नहीं था कि किस तरीके से काम किया जाए , कैसे इस तरह के बच्चों से जुड़ा जाए लेकिन उनके मन के अटल विश्वास ने उन्हें रास्ता दिखा दिया और वह उस पर चल पड़े सबसे पहले उन्होंने सोचा कि शहर कि जो स्थानीय एनजीओ हैं उनके पास जाकर इस मुद्दे के ऊपर बात करें, उनके द्वारा अच्छी प्रतिक्रिया मिलने पर 6 अगस्त 2020 को उन्होंने प्रोजेक्ट पहुंच को शुरू कर दिया |

 

 

आपने प्रोजेक्ट “पहुंच” की शुरुआत कैसे की और ऐसे बच्चों की जानकारी आपको कैसे मिली? 

 Teach For India,  और Angel Express जैसे कई  एनजीओ से संपर्क किया और उन्हें अपने इस विचार के बारे में बताया उन्होंने हमें इस तरह के बच्चों से जुड़ने में बहुत सहायता की, तथा जिन बच्चों  को फोन या टेबलेट की जरूरत थी इन एनजीओ की मदद से हमें जो भी पैसे  डोनेशन के रूप में प्राप्त होते थे हमने उन बच्चों को फोन और टेबलेट भी प्रदान किया |  फिर जब हमें अच्छी प्रतिक्रिया मिलने लगी तो तो हमें या लगा कि इसे और बड़े पैमाने पर करने की जरूरत है ज्यादा से ज्यादा लोगों से जुड़ने की जरूरत है ताकि हम जरूरत मंद बच्चों तक पहुंच पाए तभी हमने अनुष्का जयपुरिया जो कि सोशल मीडिया  फील्ड की काफी जानकारी रखती है उन्हें हमने अपनी टीम में शामिल किया और फिर बाद में जरूरत के अनुसार नतालिया मिस्त्री और मालिनी दासगुप्ता को भी टीम में लिया गया |

हम खुद भी एक छात्र है तो हमारी एग्जाम्स और असाइनमेंट को देखते हुए हमने सारे काम को अपनी टीम में बांट दिया और फिर सुचारू ढंग से हम इसके ऊपर काम करने लगे |

जब भी हम किसी बच्चे को फोन या टैबलेट प्रदान करते थे तो उनके चेहरे पर जो एक मुस्कान होती थी और उनके माता-पिता द्वारा जो प्रतिक्रिया और सकारात्मक भावना हमें मिलती थी उसके जरिए हमारा मनोबल बढ़ने लगा और उस मनोबल ने ही हमें इस मुद्दे के ऊपर काम करते रहने के लिए हर वक्त प्रोत्साहित किया|

 

 

शुरुआत में थोड़ी कठिनाई हुई ,  हमें अपनी दिनचर्या थोड़ी बदलनी पड़ी जो खाली समय हम यूं ही बता दे देते अब उस खाली समय को हम इस  मुद्दे के ऊपर काम करने में उपयोग कर रहे थे मन में कई प्रकार की दुविधाए  भी थी क्या हम जो विचार मन में लेकर यह काम कर रहे हैं हम उस में सफल होंगे या नहीं,  हम उन लोगों तक पहुंच पाएंगे या नहीं बहुत  सारे अलग प्रकार के विचार मन में आते थे लेकिन  हमने सोचा कि  शुरुआत करने से पहले ही परिणाम सोच कर पीछे हट जाने से अच्छा है कि एक बार शुरू तो करते हैं  यदि हम दो या तीन बच्चों की भी मदद कर पाए तो हमारे लिए बहुत है|

 

 अभी तक इस प्रोजेक्ट के जरिए आप कितने बच्चों तक पहुंच पाए हैं और उनकी मदद करने में सफल हुए हैं ?

अभी तक हमने तकरीबन  120 बच्चों जिनमें से ज्यादातर बच्चे मुंबई के है और कुछ बच्चे पुणे के भी है, उन्हें हमने फोन और टेबलेट प्रदान करके ऑनलाइन शिक्षा ग्रहण करने में मदद की है, और हाल  ही में हमें रोटरेक्ट क्लब के जरिए भी एक अच्छी डोनेशन की राशि प्राप्त हुई है |

हमारे यह मानना है कि शिक्षा के ऊपर सबका हक है कोई भी महामारी या किसी भी प्रकार आपदा की वजह से बच्चों का भविष्य संकट के घेरे में आए, यह कहीं से भी न्याय संगत प्रतीत नहीं होता है हमने खुद को जब उन बच्चों की जगह रख कर देखा तो हमें इस बात का एहसास हुआ कि  महामारी की वजह से बेशक हमारी दिनचर्या बदल गई है लेकिन जो सुख सुविधाएं हमारे पास है उसके जरिए हमारी शिक्षा में किसी प्रकार की रुकावट नहीं आएगी लेकिन जो वह बच्चे हैं उनके तो भविष्य के ऊपर ही प्रश्नचिन्ह लग गया है,  इस समस्या की गंभीरता को समझते हुए मुद्दे के ऊपर काम करना हमारे लिए भी मात्र लक्ष्य बन गया था और इस काम को करने के लिए हमारे माता-पिता ने  भी हमारा बहुत सहयोग किया|

 

भविष्य में प्रोजेक्ट “पहुंच” को लेकर आपके क्या इरादे है?

 लाकडाउन  पूरी तरह से खुलने के बाद स्कूल भी खुल जाएंगे और उस दौरान बच्चों, को फोन या टैबलेट की इतनी जरूरत नहीं पड़ेगी मगर फिर भी बहुत सारे ऐसे बच्चे हैं जो स्कूल की शिक्षा ग्रहण करने में सक्षम नहीं है तो हमने उन बच्चों की मदद करने के लिए सोचा है | 

इतनी छोटी सी उम्र में मन में इस तरह के विचार लाना ही अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन मलाइका और ईशान ने नसिर्फ इस समस्या के बारे में सोचा बल्कि महामारी के अनेक बाधाओं को नजरअंदाज करते हुए इस मुद्दे के ऊपर  काम भी किया और आज उनके  इस प्रोजेक्ट  के जरिए 120 बच्चे बिना किसी रूकावट के अपनी शिक्षा प्राप्त कर पा रहे हैं 

 

 

तर्कसंगत की टीम, उनकी इस उपलब्धि के लिए बधाई देती है और साथ ही या आशा करती है कि वह इस प्रोजेक्ट पहुंच के जरिए समाज के लिए और भी बेहतर काम कर सके तथा आज के युवाओं से यह निवेदन भी करती है की मलाइका और ईशान की तरह ही , देश का हर युवा यदि समाज के लिए कुछ करने की ठान ले तो कोई भी परेशानी या बाधा उनके आगे अपने घुटने टेक लेगी, बस जरूरत है तो मजबूत इरादे और एक बेहतर सोच की |

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