पर्यावरण

आईआईटी खड़गपुर ने खीरे के छिलके से पर्यावरण अनुकूल खाद्य पैकेजिंग सामग्री तैयार की

तर्कसंगत

November 25, 2020

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खीरे (Cucumber) के छिलके से बने सेलूलोज़ नैनो-मैटेरियल ने फूड पैकेजिंग मैटेरियल के लिए पर्यावरण के अनुकूल विकल्प खोजने की चुनौती को संबोधित किया है। आईआईटी खड़गपुर (IIT Kharagpur) के शोधकर्ताओं ने खीरे के छिलकों से सेलुलोज नैनो-क्रिस्टल बनाए हैं, जिससे भविष्य में पर्यावरण के अनुकूल फूड पैकेजिंग मैटेरियल बनाने की संभावना बढ़ जाएगी।

जबकि सिंगल-यूज प्लास्टिक ज्यादातर पर्यावरण के प्रति जागरूक उपभोक्ताओं द्वारा बचाया जा रहा है, इस तरह के पॉलिमर अभी भी फूड पैकेजिंग वस्तुओं के रूप में प्रचलन में हैं।

आईआईटी खड़गपुर में प्रोफेसर जयीता मित्रा और रिसर्च स्कोलर एन साई प्रसन्ना द्वारा खीरे के छिलकों से बनाया गया सेल्यूलोज नैनो-मैटेरियल ने फूड पैकेजिंग मैटेरियल के लिए पर्यावरण के अनुकूल विकल्प खोजने की इस चुनौती को संबोधित किया है| मंगलवार को संस्थान द्वारा जारी एक बयान में कहा गया |

“खीरे के कचरे के रूप में छिलके या पूरी स्लाइस की प्रोसेसिंग के बाद लगभग 12 प्रतिशत अपशिष्ट उत्पन्न करते हैं। हमने इस प्रोसेस्ड मैटेरियल से सेलूलोज़ अर्क का उपयोग किया है”, कृषि और खाद्य इंजीनियरिंग विभाग में IIT खड़गपुर के सहायक प्रोफेसर डॉ. मित्रा ने कहा।

निष्कर्षों के बारे में बात करते हुए, उन्होंने बताया कि “हमारे अध्ययन से पता चलता है कि खीरे के छिलकों से प्राप्त सेलुलोज नैनोक्रिस्टल्स के पास पर्याप्त मात्रा में गुण होते हैं। इसके परिणामस्वरूप बेहतर जैव-क्षरण और जैव-अनुकूलता होती है।”

उन्होंने कहा, “ये नैनोसेलुलोज मैटेरियल अपने अद्वितीय गुणों के कारण मजबूत, नवीकरणीय और किफायती सामग्री के रूप में उभरी है।” डॉ. मित्रा ने कहा कि वर्षों से फूड पैकेजिंग में पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक के उपयोग में वृद्धि पर्यावरण प्रदूषण का स्रोत बन गई है।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि खीरे के छिलके में अन्य छिलके के कचरे की तुलना में अधिक सेल्यूलोज मैटेरियल (18.22 प्रतिशत) होती है, जिससे यह अधिक अनुकूल हो जाता है। शोधकर्ता विभिन्न क्षेत्रों जैसे पेपर मेकिंग, कोटिंग एडिटिव्स, बायो कम्पोजिट्स और वैकल्पिक रूप से पारदर्शी फिल्मों में इसके दायरे के बारे में आशावादी हैं।

डॉ. मित्रा ने कहा, “विभिन्न जैव-पॉलिमर पर केंद्रित अधिक शोध और उत्पाद विकास से लोगों को इस क्षेत्र के बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त करने में मदद मिलेगी और यह कैसे आर्थिक कीमतों पर वैकल्पिक जैव-अनुकूल उत्पाद प्रदान कर सकता है, इसके बारे में पता चलेगा।”

 

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