अपने बेटे को खोने के बाद राज जरीवाला ने आदिवासी बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए एनजीओ शुरू किया Hardik Jariwala Foundation

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अपने बेटे को खोने के बाद राज जरीवाला ने आदिवासी बच्चों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए एनजीओ शुरू किया

तर्कसंगत

November 26, 2020

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अपने बेटे की याद में, राज जरीवाला (Raj Jariwala), जिन्हें राज भाई के नाम से भी जाना जाता है, ने हार्दिक जरीवाला फाउंडेशन (Hardik Jariwala Foundation) की स्थापना की जो विभिन्न सामाजिक कारणों के लिए काम करता है। नॉट-फॉर-प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन (NGO), जिसका नाम उनके बेटे के नाम पर रखा गया है, का उद्देश्य तीन मुख्य क्षेत्रों – विद्यादान (शिक्षा का दान), अन्नदान (भोजन का प्रबंध), और अंत में, वस्त्रदान (कपड़ों का दान) है।

जब राज जरीवाला ने अपने 12 साल के बेटे, हार्दिक को खो दिया, तो वह पूरी तरह से  टूट चुके थे और उनका निजी जीवन थम सा गया था। 1999 में अपने बेटे को एक दुर्घटना में खोने के सदमे ने उनके पूरे परिवार को एक दुखद स्थिति में भेज दिया। जब दुर्घटना हुई उनका बड़ा बेटा, रवि भी महज 15 साल का था और दुर्भाग्यपूर्ण नुकसान से परिवार में निराशा का माहौल पैदा हो गया था। जरीवाला याद करते हैं कि वे पूरी तरह से बिखर गए थे और यह उनके परिवार के लिए एक मुश्किल समय था। उन्होंने अपने परिवार की देखभाल के लिए अपने व्यवसाय को बंद करने का फैसला किया और इसके बजाय कुछ सामाजिक मुद्दे के उपर काम करने का सोचा |

जरीवाला ने फैसला किया कि वह ग्रामीण क्षेत्रों में जरूरतमंदों और वंचितों की सेवा करने पर ध्यान केंद्रित करेंगे। कुछ करीबी दोस्तों की मदद से, उन्होंने शिक्षा, भोजन और कपड़ों के मुद्दों के उपर, गुजरात के एक आदिवासी जिले,डांग में सबरीधाम के पास मोखमाल गांव में काम करना शुरू किया।  पहली बार 2002 में आदिवासी गांव मोखमाल का दौरा करते हुए याद करते हुए बताते हैं ,”चूंकि आदिवासी गांव दूरदराज के इलाके में स्थित है, उन्होंने देखा कि इस क्षेत्र में सालों से कोई विकास नहीं हुआ था। उस क्षेत्र के लोग बेहद कठिन जीवन जी रहे थे। मोखमाल सिर्फ 2,500 आदिवासी ग्रामीणों का घर है”

दूरस्थ स्थान के कारण, गाँव में उचित मोबाइल कनेक्टिविटी नहीं है और साथ ही बिजली कनेक्शन भी उपलब्ध नहीं है। बुनियादी सुविधाओं की कमी से गाँव में आगे अधिक विकास होना मुश्किल हो जाता है।

2002 के बाद से, उन्होंने गांव का दौरा करना शुरू कर दिया तथा बच्चों और ग्रामीणों के साथ बातचीत भी शुरू कर दी। बच्चों सहित स्थानीय लोगों के साथ बातचीत करने के बाद, उन्होंने महसूस किया कि बुनियादी स्टेशनरी सामग्री और बैग की कमी बच्चों के स्कूल में अनुपस्थिति और  ड्रॉप-आउट दरों ( पूरी पढ़ाई  खत्म होने से पहले ही स्कूल छोड़ देने का दर) के पीछे एक प्रमुख कारण है। उन्होंने एनजीओ को औपचारिक रूप से स्थापित करने के बाद स्कूल में आवश्यक वस्तुओं का दान करना शुरू कर दिया। समय के साथ, जरीवाला ने महसूस किया कि यदि स्कूल में सभी आवश्यक स्टेशनरी आइटम प्रदान किए जाते हैं, तो उपस्थिति में सुधार होगा, और क्षेत्र की स्थिति में भी सुधार होगा।

उनके इस पहल के तुरंत बाद, यह देखा गया कि आस-पास के गांवों के बच्चों ने भी इस विशेष स्कूल में भाग लेने में दिलचस्पी दिखाई। मोखमाल गाँव से 12 किलोमीटर दूर रहने वाले छात्रों ने अपने गाँव से यात्रा शुरू की ताकि वे स्कूल जा सकें। जरीवाला ने साझा किया कि कई छात्र गांव में अपने रिश्तेदारों के साथ रहने लगे और केवल छुट्टियों के दौरान घर जाते थे। “यह हमारे लिए एक बहुत बड़ी प्रेरणा थी,” वे बताते हैं।

गाँव में सिर्फ एक स्कूल के साथ जो शुरू हुआ था वह अब शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता और खेल उपकरणों के साथ 800 से अधिक बच्चों के साथ एक आंदोलन बन चुका था, मुख्य स्कूल के अलावा जिसे शुरू में गाँव में शुरू किया गया था, अब वह फाउंडेशन के काम के हिस्से के रूप में चार अन्य स्कूलों की मदद करता है। वह एक अनुभव याद करते हैं जहां उन्होंने एक चिकित्सा शिविर के दौरान एक लड़की की मदद की थी जिसे उन्होंने स्थापित किया था। लड़की के दिल के ऑपरेशन में लगभग दो लाख रुपये का खर्च था। फाउंडेशन ने उसकी सर्जरी के लिए एक लाख रुपये का योगदान दिया और जरीवाला को चेन्नई में एक अस्पताल भी मिला जो लड़की के दिल की सर्जरी के लिए 50% की छूट देने के लिए तैयार था।

वह अपनी यात्रा पर लड़की और उसके माता-पिता के साथ आगे बढ़े। स्विट्जरलैंड के एक हृदय रोग विशेषज्ञ ने उब लड़की का ऑपरेशन किया और सर्जरी सफल रही। सर्जरी के बाद लड़की अब सामान्य जीवन जीती है। 

स्कूलों में पढ़ने वाले कई अन्य छात्रों ने अंततः अहवा और मेहसाणा में कॉलेजों में प्रवेश लिया। स्कूल से पास हुए छात्र भी गाँव में बच्चों को पढ़ाने के लिए वापस आते थे|

2019 से, फाउंडेशन ने अपने कॉलेज के पाठ्यक्रमों जैसे कि डिप्लोमा और स्नातक की डिग्री के लिए असाधारण छात्रों को छात्रवृत्ति प्रदान करना शुरू कर दिया। वर्तमान में फाउंडेशन ,गुजरात में तीन लड़कियों के लिए आतिथ्य (Hospitality) और प्रबंधन(Management) के पाठ्यक्रमों को भी शुरू कर रहा है। स्नातक की डिग्री पूरी करने के बाद, वे  fund को बढ़ाएंगे भी  ताकि ये लड़कियां अपनी मास्टर डिग्री पूरी कर सकें।

इससे पहले कि महामारी शुरू हो जाती, जरीवाला और फाउंडेशन के अन्य स्वयंसेवकों ने मोखमाल में ग्रामीणों को सैनिटाइज़र का उपयोग करने और हैंडवाशिंग की अवधारणा पेश की। 2017 से, वे आदिवासी इलाकों में स्वच्छता शिविरों का आयोजन कर रहे थे जहाँ हाथ धोने के महत्व पर चर्चा की गई थी। इसने हल्की और गंभीर बीमारियों को रोकने में मदद की। जरीवाला स्टेशनरी किट और वर्दी  बांट कर अपने बेटे की स्मृति का सम्मान करते है। वह अपने बेटे की जयंती की याद में 2013 से इस अनुष्ठान को जारी रखे हुए है। कार्य के दौरान उनकी यात्रा बिल्कुल भी आसान नहीं रही है।

वह बताते हैं कि जब उन्होंने फैसला किया कि वह केवल आदिवासी क्षेत्रों में काम करेंगे। हालाँकि उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में काम करना चुना, लेकिन इन क्षेत्रों की यात्रा करना एक बड़ी चुनौती थी। उन्हें लगता है कि चुनौतियों के प्रति किसी का रवैया इसे सुलझाने में ज्यादा मायने रखता है। उन्होंने खुद को पूरी तरह से सामाजिक कार्यों के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी फैक्ट्री को किराए पर भी दे रखा है, और जो कुछ भी वे उससे कमाते हैं, वह उसका इस्तेमाल बुनियादी जरूरतों और चैरिटी के काम के लिए करते हैं। उनका पूरा परिवार, जिसमें उनके बेटे रवि, उनकी बहू, उनकी पोती भी शामिल हैं, उनके चल रहे सामाजिक कार्यों का समर्थन करते हैं और उनकी परियोजनाओं में उनकी मदद करते हैं।

संगठन के स्वयंसेवक   foundation के प्रभाव को अधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिए प्रयास जारी रखते हैं। वह उन कामों से संतुष्ट हैं जो वह बच्चों के लिए कर रहे हैं और  उसे जारी रखना चाहते हैं। यह कहानी गिविंग सर्कल से प्राप्त हुई है। यह एक ऐसा मंच है जो सामाजिक परिवर्तन करने वालों, दानदाताओं और स्वयंसेवकों को जोड़ता है। वे इन पहलों को बढ़ाने के लिए काम कर रहे हैं।

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