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सुप्रीम कोर्ट का आदेश- राजद्रोह कानून पर जब तक पुनर्विचार नहीं, तब तक इसके तहत कोई भी मामला दर्ज नहीं होगा

तर्कसंगत

May 11, 2022

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1870 में बने देशद्रोह कानून पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. कोर्ट ने आदेश दिया है कि जब तक IPC की धारा 124-ए की री-एग्जामिन प्रोसेस पूरी नहीं हो जाती, तब तक इसके तहत कोई मामला दर्ज नहीं होगा. कोर्ट ने पहले से दर्ज मामलों में भी कार्रवाई पर रोक लगा दी है. वहीं, इस धारा में जेल में बंद आरोपी भी जमानत के लिए अपील कर सकते हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद विपक्ष एक बार फिर केंद्र सरकार पर हमलावर हो गया, जबकी सरकार की तरफ से भी जवाब दिया गया.

कानून मंत्री किरेन रिजीजू ने कहा- हम कोर्ट और इसकी स्वतंत्रता का सम्मान करते हैं, लेकिन एक लक्ष्मण रेखा है, जिसका सम्मान सभी अंगों द्वारा किया जाना चाहिए. कानून मंत्री ने आगे कहा कि हमने अपनी स्थिति बहुत स्पष्ट कर दी है और PM मोदी के इरादे के बारे में कोर्ट को सूचित किया है.

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की विपक्ष ने जमकर तारीफ की. साथ ही केंद्र सरकार पर हमला भी बोला. इस मामले को लेकर कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट कर लिखा कि, ‘‘सच बोलना देशभक्ति है, देशद्रोह नहीं. सच कहना देश प्रेम है, देशद्रोह नहीं. सच सुनना राजधर्म है, सच कुचलना राजहठ है. डरिए मत!’’ कांग्रेस पार्टी ने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह भी साबित हो गया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने राजद्रोह कानून को खत्म करने का जो वादा किया था वह सही रास्ता था.

माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने प्रेस वार्ता में कहा कि माकपा ने हमेशा राजद्रोह कानून का विरोध किया है और इसे अंग्रेजों द्वारा हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के दमन के लिए लाया गया दोषपूर्ण कानून कहा है. स्वतंत्र भारत में कानून की किताबों में इसकी कोई जगह नहीं है. अच्छी बात है कि कोर्ट ने आदेश दिया है कि इस प्रावधान पर रोक रहेगी.

राजद्रोह कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई थीं. जिन पर लगातार सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा गया कि, राजद्रोह कानून में बदलाव की जरूरत नहीं है. लेकिन कोर्ट ने सभी पक्षों को अपना बयान स्पष्ट करने का वक्त दिया. पिछले गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की थी. इस दौरान केंद्र की ओर से यह दलील दी गई थी कि इस कानून को खत्म न किया जाए, बल्कि इसके लिए नए दिशा-निर्देश बनाए जाएं.

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